जल : अतीत.. वर्तमान और भविष्य –
-रजत मुखर्जी
जल पृथ्वी का एक अमूल्य प्राकृतिक संसाधन है।जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।पृथ्वी पर सभी जीव-जंतु, पेड़-पौधे और मनुष्य जल पर निर्भर हैं। जल न केवल पीने के लिए आवश्यक है, बल्कि कृषि, उद्योग और दैनिक जीवन के अनेक कार्यों के लिए भी आवश्यक है।
पृथ्वी की सतह का अधिकांश भाग जल से ढका हुआ है, लेकिन इसका बहुत बड़ा हिस्सा समुद्रों का खारा जल है, जिसे सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता।पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल में मीठे जल की मात्रा बहुत कम है।इसी कारण मीठे जल का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
मीठा जल मुख्य रूप से नदियों, झीलों, तालाबों, भूजल तथा हिमनदों (ग्लेशियरों) में पाया जाता है।पृथ्वी के कुल जल का केवल एक छोटा सा भाग ही मानव उपयोग के लिए उपलब्ध है।जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिकीकरण तथा शहरीकरण के कारण जल की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।
जल चक्र के माध्यम से जल एक स्थान से दूसरे स्थान पर संचरित होता रहता है।सूर्य की ऊष्मा से जल वाष्पित होकर बादलों का निर्माण करता है और वर्षा के रूप में पुनः पृथ्वी पर लौटता है।यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।
वर्षा पृथ्वी पर मीठे जल का प्रमुख स्रोत है।लेकिन वर्षा का जल समान रूप से वितरित नहीं होता। कहीं अत्यधिक वर्षा के कारण बाढ़ आती है, तो कहीं वर्षा की कमी से सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।बाढ़ और सूखा दोनों ही मानव जीवन तथा पर्यावरण के लिए गंभीर समस्याएँ हैं।
मानव गतिविधियों के कारण जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।नदियों, झीलों और तालाबों का प्रदूषण, भूजल का अत्यधिक दोहन तथा वनों की कटाई जल संकट को और गंभीर बना रहे हैं। औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू कचरा और रासायनिक पदार्थ जल को दूषित कर रहे हैं।
जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन, जल का विवेकपूर्ण उपयोग, नदियों और जलाशयों की सफाई तथा वृक्षारोपण जैसे उपाय आवश्यक हैं। लोगों में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ानी चाहिए और जल के अपव्यय को रोकना चाहिए।
यदि आज जल का संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।इसलिए जल को बचाना और उसका उचित प्रबंधन करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
