
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में वक्फ संशोधन क़ानून 2025 पर सुनवाई हुई.कोर्ट ने वक्फ संशोधन कानून 2025 के तहत यूजर द्वारा वक्फ के निबंधन सम्बन्धी प्रावधान पर रोक लगाने से इंकार कर दिया,लेकिन क़ानून के उस प्रावधान को शिथिल कर दिया जिसके तहत वक्फ के लिए व्यक्ति को कम से कम पांच वर्षो तक इस्लाम धर्म को मानने वाला होना अनिवार्य कर दिया गया था.कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले में जब तक राज्य सरकारें कोई सर्वमान्य क़ानून नहीं बनाती हैँ तब तक इसे लागू नहीं किया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति ए जी मसीह की खंडपीठ वक्फ संशोधन क़ानून 2025 की संवैधानिक वाद्यता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस सन्दर्भ में 1923 से लेकर अभी तक के सभी विधाई प्रावधानों की अदालत द्वारा प्रथम दृष्टया समग्र समीक्षा की गई और इस सम्बन्ध में दायर सभी याचिकाओं पर विचार के बाद यह प्रतीत होता है कि वक्फ संशोधन क़ानून 2025 के सभी प्रावधानों को ख़ारिज करने के सम्बन्ध में याचिकायें दायर नहीं की गई हैं.क़ानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी गई है जिसे प्रोटेक्शन की जरुरत है.
हालांकि कोर्ट ने वक्फ बोर्ड में नॉन मुस्लिम सदस्य के शामिल किये जाने के प्रावधान पर रोक नहीं लगाया लेकिन 20 सदस्यों वाले बोर्ड में ऐसे सदस्यों की संख्या 4 से अधिक नहीं और राज्य स्तर पर 11 सदस्यों वाले बोर्ड में 3 से अधिक नहीं रखने की वध्यता कर दी.
सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ संशोधन क़ानून 2025 के उस प्रावधान पर भी रोक लगाने का निर्णय सुनाया जिसके तहत अधिकृत सरकारी अधिकारी को वक्फ की किसी संपत्ति को सरकारी सम्पति बता कर सरकार को रिपोर्ट करने का अधिकार दिया गया था.कोर्ट ने कहा कि कलेक्टर को किसी संपत्ति के अधिकार के सम्बन्ध में निर्णय करने की अनुमति देना सत्ता के विकेंन्द्रिकरण के सिद्धांत के खिलाफ है.कोर्ट ने कहा कि किसी कार्यपालक अधिकारी को किसी संपत्ति के अधिकार पर निर्णय सुनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.
