अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष :-
भारतीय नारी-
शास्त्र के अनुसार स्त्री धर्म की रक्षा के कारण ही भारत देवताओं का निवास स्थान बना था.देवताओं को अमर लोक से मृत्युलोक में उतारने के लिए एक नारी धर्म को ही समर्थ माना गया है.प्राचीन काल में भारत में सती सावित्री,देवी सीता,माता अनुसूईया इत्यादि को नारी धर्म का आदर्श माना गया है.सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने अपने को दो रूपों में विभक्त किया,आधे से पुरुष और आधे से नारी का प्रदुर्भाव हुआ.वाम भाग से स्त्री और दक्षिण भाग से पुरुष की उत्पत्ति हुई.धर्मपरायन भारत में वेद, पुराण ,स्मृति,इतिहास तथा प्राकृतिक विज्ञानं से भी स्त्रियों को पुरुषों की अर्धांगिनी माना गया है.भारतीय पद्धति के अनुसार किसी धार्मिक सामाजिक तथा लौकिक कृत्य में भी स्त्री और पुरुष के उत्तरीया वस्त्रों के छोरों से ग्रंथिबंधन किया जाता है.आदर्शप्रधान भारत में स्त्रियों को अधिकाधिक सम्मान दिया गया है.इसी देश में विद्वान साधु सन्यासी,बालक,वृद्ध एवं सदगृहस्थ सभी लोग समान्यत: स्त्री को माता कह कर सम्मान दिया जाता है.सभी गृहस्थो के घर में स्त्रियां लक्ष्मी समझी जाती है.
भारतीय प्राचीन परंपरा के अनुसार किसी भी सार्वजनिक स्थान पर स्त्रियों के लिए विशेष सुविधा के मार्ग खोले जाते हैं.मान्यता है की जिस गृहस्थ के घर में नारियों का अपमान होता है वह घर लक्ष्मी से शून्य हो जाता है.नारी को मातृ शक्ति माना जाता है.भारतीय संस्कृति ने नारी को माता के रूप में पुजित कर इस रहस्य का उद्घाटन किया है कि वह मानव के उपभोग की वस्तु न होकर उसकी वंदनीयता एवं पूजनीया है.इसी नाते मानव धर्मशास्त्र में जननी का गौरव उपाध्याय से दस लाख गुना,आचार्य से लाख गुना और पिता से हजार गुना बढ़ कर बताया गया है.नारी का मातृत्व पुरुष के साथ समानता के सिद्धांत के अनुसार किये गए किसी बंटवारे में नहीं मिला.यदि ऐसा होता तों वह बंदनीय नहीं हो पाती.शास्त्रीय दृष्टि में उसका यह मातृत्व दयामई जगन्नमाता का प्रसाद है जिनका रूप कहलाने का गौरव सारे नारी समाज को प्राप्त हुआ है.विष्णु पुराण के अनुसार भी सामान्य रूप में देव समाज मानव समाज के पुरुषत्व में भगवान विष्णु की अभिव्यक्ति है और स्त्रीत्व में माता लक्ष्मी की.
इसके अतिरिक्त जिन महिलाओं ने राष्ट्र का संरक्षण किया है तथा त्याग,तपस्या सेवा भक्ति आदि के द्वारा इतिहास के पन्नों को अलंकृत करते हुए आदर्श स्थापित किया है वें जगन्नमाता की विशिष्ट विभूतियाँ हैं.आवश्यकता इस बात की है कि मानव समाज नारियों का समादर एवं संरक्षण करें.
रजत मुख़र्जी की कलम से
