शिक्षा ऋषि रवीन्द्रनाथ:-
रवीन्द्रनाथ ठाकुर कवि थे। महान हिन्दू शास्त्र पर काबू पाकर शब्द और भाषा का चातुर्य के साथ प्रयोग करके कविताएँ लिखते थे।गद्य लेखन में वे नये चिंतन कविता के द्वारा सत्य की उपासना की। समाज में जो चिंतन किया, प्रकृति, मानव और सामाजिक जीवन इन सबका एक साथ विचार करके उनके द्वारा उनका विश्वदर्शन एक विराट और स्पष्ट रूप प्राप्त किया और उनके सम्बन्ध से जो जीवन दर्शन का आकार होता है उसकी उपासना की,इसलिए मेरे विचार से रवीन्द्रनाथ एक महान कवि थे।उनके मूल वैदिक अर्थ में स्वतंत्र, स्वयं सृजन, स्वतंत्र सृजन और संस्कृति की नींव पर मानवता की उपासना किस प्रकार करनी चाहिए इसका बोध कराने के लिए उन्होंने शिक्षा का प्रयोग किया।वे मानते थे कि ज्ञान-पीपासा और औद्योगिक विकास दोनों के लिए विश्व में समान स्थान होना चाहिए और उपयोगी मूलक औद्योगिक विकास के साथ संतुलन भी आवश्यक होना चाहिए।वे आगे कहते थे कि यदि जीवन में काव्य, संगीत, नृत्य, नाटक, चित्रकला आदि के लिए स्थान है, तो शिक्षा में और औद्योगिक विकास में भी इनके लिए स्थान होना चाहिए।
स्कहा जाता है कि स्वामी विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ, अरविन्द घोष, गांधीजी और राधाकृष्णन ये हैं हमारी भारतीय संस्कृति के पाँच प्रधान उद्गाता।इनका संस्कृति पर जो प्रभाव है वह अलग है और विदेशों पर अलग है। राधाकृष्णन जी का प्रभाव अधिक विदेशों पर है। उन्होंने विदेशों में अध्यापक का काम किया लेकिन नेतृत्व नहीं किया। भारतीय संस्कृति का विशिष्ट अंग समग्रता के रूप में और शैली में इनकी कला संग्रहीत होती है।
स्वामी विवेकानन्द ने संसार के सामने हमारा वेदांत रखा। ज्ञानयोग, भक्ति योग और राजयोग से लोगों का उन्होंने परिचय कराया।
अरविन्द घोष ने सार्वभौम दृष्टि से वेदान्त विद्या का सर्वश्रेष्ठ शांत स्वरूप लेकर दुनिया के सामने रखा।
गांधीजी ने अपने कृतित्व के माध्यम से वातावरण में घूम-फिरकर अध्ययन किया।उनकी तपस्या और गहरे अध्ययन के द्वारा नहीं बल्कि गुरु के वातावरण से और समाज के सम्पर्क से परम्परा का परिचय प्राप्त किया। कर्मयोग के द्वारा आध्यात्मिक विकास करते हुए उन्होंने इस परम्परा का जीवन चरित्र स्पष्ट किया।
भारतीय संस्कृति का सर्वोच्च आदर्श उसकी सुगन्ध और सुन्दरता का गान अखण्ड गाथा है। वैदिक संस्कृति का उज्ज्वल स्वरूप उन्होंने दुनिया के सामने प्रकट किया और आखिर में सबको प्रेरित होकर विश्वमानव की भूमिका पर आग्रह करते हुए विश्व-सहकार की पुकार चलायी।
स्वतंत्र मनुष्य कहलाता है किन्तु सहज भाव से यदि जीते तो उसकी दृष्टि विश्व के प्रति विशाल और कल्याणमयी होती है। इसका एक मिसाल रवीन्द्रनाथ ने दुनिया के सामने पेश की है।
यही बात हम आज भी वैश्विक परिवेश में स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि रवीन्द्रनाथ हमारी परम्परा-सिद्ध भारतीय संस्कृति के महान उद्गाता हैं।उन्होंने सिद्ध किया है कि विश्व के परिवार में हमारे लिए प्रेम का और आदर का स्थान है।
-रजत मुखर्जी
शिक्षाविद
