देश में तेजी से पनप रही बुलडोजर संस्कृति पर न्यायालय की हमेशा तल्ख टिप्पणी आती रही है।ताज़ा मामला उड़ीसा के कटक जिला का है,जहां के एक निवासी द्वारा उड़ीसा उच्च न्यायालय में जिला प्रशासन द्वारा दशकों पुराने कम्युनिटी सेंटर को बुलडोजर द्वारा गिराए जाने के विरोध में याचिका दायर की गई थी।हाई कोर्ट के जस्टिस एस के पनिग्रही की एकल पीठ ने 20 जून को मामले की सुनवाई करते हुए संबंधित तहसीलदार को कड़ी फटकार लगाई और इस नुकसान की आंशिक क्षतिपूर्ति तहसीलदार के वेतन से किए जाने का आदेश दिया।कोर्ट के अनुसार वह भवन गिराए जाने की घटना पिछले वर्ष 24 दिसंबर की है जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नवंबर में ही दिए गए गाइड लाइन का भी सरासर उलंघन है।पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश दिया था कि डेमोलिशन से पहले न्यायिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। इसके अन्तर्गत डेमोलिशन से पहले 15 दिनों की अग्रिम नोटिस सर्व करना अनिवार्य कर दिया गया था।
कोर्ट ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया में कहा कि इस तरह के मामले में देश में प्रचलित हो चली बुलडोजर जस्टिस की परिपाटी परेशान करने वाली है जहां कार्यपालिका शक्ति न्यायिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करने लगी है। कोर्ट ने आगाह किया कि ऐसे मामले में अधिकारियों की स्वेच्छाचारी प्रवृति एक खतरनाक उदाहरण पेश करते हैं।कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की कार्यप्रणाली ऐसी बनती जा रही है जहां न्यायिक प्रक्रिया को सेकेंडरी समझा जाने लगा है।कोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार को 10 लाख रुपए का मुआवजा याचिकाकर्ता को देने का निर्देश दिया जिसमें 2 लाख रुपए की राशि तहसीलदार के वेतन से रिकवर करने का निर्देश दिया गया है।कोर्ट द्वारा तहसीलदार के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के भी आदेश दिए गए हैं।साथ ही राज्य के मुख्य सचिव को राज्य के सभी राजस्व अधिकारी और नगर निगम अधिकारियों को डेमोलिशन के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपाल करने का निर्देश देने के लिए कहा गया है।
