ग्लोबल वर्मिंग से खतरे में है समुद्र के अंदर बसे जीव-
आज विश्व उष्णायन(Global Warming) से सभी प्रभावित हैं-मनुष्य,पशु पक्षी,पेड़ पौधे.मनुष्य इससे निपटने की तैयारी में लगा है लेकिन अन्य प्राणियों का क्या होगा यह एक जटिल यक्ष प्रश्न है.जीवन का स्रोत सागर global warming के कारण विनाश की राह पर चल रहा है.वैज्ञानिक इस विनाश लीला पर ब्रेक लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि मौसम में बदलाव का समुद्र के नीचे रह रहे जीवधारियों के जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है? खास कर कार्बन डाय ऑक्साइड समुद्री जीवन को कैसे प्रभावित कर रहा है.वैज्ञानिकों ने पाया है कि पानी में कार्बन डाय ऑक्साइड मिला देने से उसका पी एच वैल्यू गिर जाता है और समुद्र का पानी अम्लीय हो जाता है,इसका असर समुद्र के नीचे रह रहे जीवों पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है.अपने प्रयोग में वैज्ञानिकों ने पाया है कि अम्लीय पानी में सीप का आकर छोटा हो जाता है.सीप,अलगई और बैक्टीरिया समुद्र के संवेदनशील जीवों में शामिल है,इनमें से एक भी कारक बदलता है तो चैन रिएक्शन शुरू हो जाता है जो फिर सबको प्रभावित करना शुरू कर देता है.समुद्र वैज्ञानिक यह पता कर रहे हैं कि पूरे सागर में कैसी परिस्थितियां हो सकती है यदि समुद्र में जीवन समाप्त हो जाता है.वैज्ञानिकों के अनुसार इसका प्रतिकूल प्रभाव दुनिया के पोषण पर पड़ेगा.समुद्री वैज्ञानिक प्रो.मार्टिन वॉल कहते है कि समुद्र की हालत ख़राब हो सकती है.वहां कम ऑक्सीजन वाला बदबूदार शोरबा बन सकता है.उम्मीद करें कि यह संतुलन लम्बे समय तक बना रहे.समुद्री पानी के अम्लीकरण का पौधों पर क्या असर होता है-यह समुद्री घास के टेस्ट से पता चला है,यदि पी एच अत्यंत कम हो जाता है तो प्रतिरोधी तत्वों का उत्पादन रुक जाता है इससे समुद्री दीमक जैसे दुश्मनों के लिए घास स्वादिष्ट आहार बन जाता है,वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवों की लगभग प्रजातियां जो सिर्फ समुद्र में पाई जाती हैं उनकी एक भी प्रजाति प्रभावित होती है तो पूरा जीवन चक्र प्रभावित होता है.अत्यंत छोटे जीव भी परिवर्तन पर प्रतिक्रिया दिखाने लगते हैं.रिसर्चर इस बात की जानकारी लगाने की कोशिश में हैं कि कौन सा जीव विभिन्न परिस्थितियों में कितनी तेजी से बदलते हैं.
ग्लोबल वर्मिंग बढ़ने पर उन जीवों पर क्या असर होगा के जबाब में प्रोफेसर मार्टिन कहते हैं कि यदि हम कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन जारी रखते हैं तो निश्चित तौर पर समुद्र का अम्लीकरण बढेगा,ग्लोबल वर्मिंग बढ़ेगी फिर दबाब डालने वाले दूसरे कारक भी बढ़ेंगे.ऐसे में हम सिर्फ उम्मीद कर सकते हैं कि यह इतनी धीमी गति से हो कि जीव अपने को उसके अनुरूप ढाल सकें.
लगातार बढ़ रही ग्लोबल वर्मिंग एक ऐसी खतरे की घंटी है जिससे जीतनी जल्दी इंसान सतर्क हो जाये उतनी ही पृथ्वी पर जीव जंतु सहित मानव जीवन की कल्पना आगे भी बरकरार रह सकती है.ऐसा न हो कि विनाश की लीला शुरू हो जाय और हम योजना ही बनाते रह जाएँ.
रजत मुखर्जी
पर्यावरणविद
