निराला जी के काव्य में विद्रोही चेतना-
हिंदी साहित्य के क्षेत्र में निराला एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व लेकर अवतरित हुए।उन्होंने जीवनपर्यंत रूढ़िगत सामाजिक और साहित्यिक व्यवस्थाओं के प्रति विद्रोह किया। निराला जी कवि रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं, परंतु वे केवल कवि नहीं, कथाकार और नाटककार भी थे।प्रगतिशील चेतना से युक्त उनका कथा साहित्य उनकी अंतर्दृष्टि का परिचय देता है। उन्होंने अपने जीवन में सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों को देखा और भोगा था; अतः उनके साहित्य में इन विसंगतियों के प्रति विद्रोह का स्वर स्पष्ट सुनाई पड़ता है।
निराला ने अपने साहित्य में जीवन की जटिल गति और उसकी विविध समस्याओं को नवीन दृष्टि से ही चुना।जो दलित और वंचित थे, वे ही निराला जी के स्वभावजन्य हैं; संसार के समक्ष वे सदैव निराला के साहित्य में उच्च स्थान पर रहे।निराला के हृदय में दीन-हीनों के प्रति दया रहती थी।उनके प्रति अनुग्रह और करुणा ने ही उन्हें क्रांति के लिए प्रेरित किया और वे उनके स्वर्णिम भविष्य के सपने बुनते रहे।
निराला जी के काव्य में विषयों की विविधता है। अपने आरंभिक काल में कवि ने भक्ति, ओज, संघर्ष, क्रांति और विद्रोह के साथ ही श्रृंगारिता में भी रचना की, किंतु जैसे-जैसे उनका संघर्ष बढ़ा, वैसे-वैसे काव्य में आक्रोश, शोषण और अन्याय के विरुद्ध स्वर मुखर होते गए।जहाँ कहीं वे अपने को विरोध करने में असमर्थ पाते, वहाँ व्यंग्य का आलंबन लेते। उदाहरणस्वरूप उनकी ‘कुकुरमुत्ता’ कविता को प्रस्तुत किया जा सकता है।इस कविता में कवि ने साधारण आदमी के साधारण जीवन को जो गरिमा और महत्व दिया है, वह असाधारण है।
निराला जी ने अपनी पुत्री का विवाह समाज के बंधनों को तोड़ते हुए कुछ मित्रों के समक्ष सम्पन्न किया।उनका यह कृत्य भी विशेष रूप से परिपूर्ण था।उन्होंने सदैव नवीन निर्माण और नवीन जीवन का सपना देखा।उनकी कविताओं में क्रांति का सही स्वरूप अंकित है। सामाजिक विषमताओं के विरुद्ध तत्कालीन समाज में क्रांति उत्पन्न कर नवीन समाज निर्माण के लिए निराला की कृति प्रेरित करती थी। ‘बादल राग’, ‘जागो फिर एक बार’ कविता को इस संदर्भ में स्मरण किया जा सकता है।उनके काव्य में बादल क्रांति का प्रतीक है और ग्रीष्म का त्रास सामाजिक उत्पीड़न का प्रतीक है। बादल जलते हुए संसार को जलधार से शीतल करता है।कवि ‘बादल राग’ में गर्जना करते हैं— “गरजो, विप्लव के नव जलधर!” उन्होंने साहित्यिक दृष्टि पर देशवासियों को स्वाभिमान का स्मरण कराया। “जागो फिर एक बार” की पुकार लगाते हुए निराला जी देशवासियों से सजग बनने का आह्वान करते हैं—
“सिंहनी की गोद से
शिशु कौन?
मौन भी क्या रहती वह रहते प्राण?
रे अजान!
एक मेषमाता ही
रहती है निरीह!”
उन्होंने काव्य के माध्यम से केवल हिंदी काव्य की रूढ़िगत परंपराओं के प्रति विद्रोह करके शिल्प की दृष्टि में ही नवीन प्रयोगों का सूत्रपात किया।उनके काव्य के कथन, विद्रोह और शिल्पकारिता में उच्छृंखलता और वाचालता नहीं आती है।इसका कारण है कि निराला जी का अपना लक्ष्य महान था।
— रजत मुखर्जी
