हिन्दी के यशस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर वर्तमान सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक विषमता के विरुद्ध बिगुल फूँक कर और वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध हुँकार भर कर राष्ट्रकवि के रूप में निखर उठे।वास्तव में राष्ट्र कवि होता कौन? सही उत्तर यही है कि जो राष्ट्र की गौरव गाथा का गान करे, उसकी अस्मिता का बोध कराए, संकट के समय राष्ट्र के सोये प्राणों में शक्ति व पौरुष का संचार करे।दिनकर जी मुख्य रूप से कवि के रूप में जाने जाते हैं।पर, गद्य में भी उनकी लेखनी उतनी ही प्रखर,सशक्त और समृद्ध है।1930 के आस-पास उनका कवि जीवन प्रारम्भ हुआ।1935 में ‘रेणुका’ के प्रकाशन के बाद दिनकर जी एक यशस्वी क्रान्तिकारी कवि के रूप में विख्यात हो गए।काव्य कौशल के धनी इस कवि को बड़ी विषम परिस्थितियों से अपनी काव्य रचना करनी पड़ी। अनेक कठिनाइयों के होते हुए भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और वे बड़े साहस के साथ सभी का सामना करते रहे।उनका जीवन आगे चलकर उनकी काव्य रचना का आधार बिंदु बना।
प्रारंभ में दिनकर जी गाँधी जी की विचारधारा से प्रभावित थे।कुछ वर्षों तक वे हिंसा और अहिंसा के विचारों में उलझे रहे, परन्तु अन्त में अत्याचार के विरुद्ध लड़ना ही उचित और श्रेयस्कर समझा।इस संदर्भ में उनकी कालजयी रचना ‘कुरुक्षेत्र’ काव्य इसका प्रतीक है।कुरुक्षेत्र के माध्यम से दिनकर जी ने देश और समाज की पीड़ा को समझा।यही इस काव्य लेखप्रेमता का प्रमुख कारण है।कुरुक्षेत्र काव्य में जब युधिष्ठिर युद्ध की निरर्थकता का रोना रोते हैं तो भीष्म पितामह इन शब्दों में कहते हैं —
“युद्ध की तुम निंदा करते हो मगर,
जब तलक हैं उठ रही चिनगारियों।
भिन्न स्वार्थों के कुलिशन संघर्षी की
युद्ध तब तक विश्व में अनिवार्य है।”
दिनकर जी की ख्याति का प्रमुख कारण उनकी राष्ट्रीय कविता है।सम्मान उन्हें ‘कुरुक्षेत्र’ काव्य से प्राप्त हुआ। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक गद्य-ग्रन्थ से उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी।स्वयं पण्डित जवाहरलाल नेहरू जी ने इस ग्रन्थ की लम्बी-चौड़ी भूमिका लिखी।
‘भारत एक है’ निबन्ध में लेखक कहता है कि भारत की एकता इसकी विविधताओं में निहित हुई है।इसकी विविधताएँ जितनी प्रत्यक्ष हैं, इसकी एकता भी उतनी ही ससक्त है।यहाँ हर क्षेत्र के अनुसार ही खान-पान, ओढ़ने-पहनावे की भिन्नताएँ हैं।फिर हर मुख्य भू-भाग की अपनी-अपनी भाषा और बोलने का लहज़ा होता है। इन भिन्नताओं के बावजूद उन सभी नदियों से बहनेवाली भावधारा एक है।भाषा कोई भी हो, उसके साहित्यकार एक ही तरह के विचारों और कथावस्तुओं को लेकर अपने साहित्य की रचना करते हैं।इसी प्रकार रामायण और महाभारत को लेकर भारत की सभी भाषाओं के बीच अद्भुत एकता मिलती है।कारण यह है कि ये दोनों आदि काव्य ग्रन्थ सभी के लिए बराबर श्रध्येय रहे हैं। इसके सिवा, संस्कृत और प्राकृत में भारत का जो साहित्य रचा गया था उसका प्रभाव सभी भाषाओं की जड़ से जुड़ा रहा है।विचारों की एकता किसी समाज की सबसे बड़ी एकता होती है। अवश्य भारतीय जनमानस की एकता का असली आधार भारतीय दर्शन और साहित्य है, जो अनेक भाषाओं में लिखे जाने पर भी अन्ततः एक साबित होते हैं।
दिनकर जी की लेखनी अन्त समय तक चलती रही। “कवि की मृत्यु” नामक कविता का पाठ करते हुए यह विलक्षण प्रतिभा का धनी कवि दक्षिण में तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर की प्रतिमा के सामने दो घण्टे तक इस कविता का धारा प्रवाह पाठ करते हुए चिर निद्रा में सो गया।जिस दिन परशुराम जयन्ती थी, “परशुराम की प्रतीज्ञा” लिखनेवाले को परशुराम ने अपने पास बुला लिया। दिनकर जी का तेज आज किस में उदय होता है — यह एक युग प्रश्न है।
— रजत मुखर्जी
